एक साधारण आदमी का ब्लॉग.. जो समय के साथ ही बड़ा हो रहा है, थोड़ा भावुक है..अपनों को प्यार करता है..
स्वागत
mukeshuwach में आपका स्वागत है. यहाँ आप देखेगें सच्ची भावनायें, रूबरू होगें उन पलों से जो आपके मन को छू जायेगी..
Monday, February 21, 2011
Sunday, January 9, 2011
सुना नहीं पाया 'निर्गुण'
छुट्टियों में घर पर था .
मामा का फोन आया नाना जी की तबियत ठीक नहीं .
नाना तुम्हारी मम्मी को बुला रहे हैं
मै माँ को ले कर गया ... रस्ते में मैंने सोचा कि आज नाना जी को निर्गुण (माया मोह से मुक्त होने वाले कबीर भजन) सुनाऊंगा.. नाना जी के पास पहुंचा तो सच में उनकी दशा ठीक नहीं थी .. नानाजी दो दिन से खाना नहीं खा पा रहे थे ... पर
वे दवा माँग कर खा लिया करते थे ... मैंने देखा कि उनमें जीवन जीने की इच्छा बची हुई है .. वो जीना चाहते है .... तो क्या...निर्गुण..... माया .......
...आज के समय में जहाँ सामाजिक मूल्यों में गिरावट आयी है..... वृद्धाश्रम ....और Old age home में लोग रह रहे है...जहाँ ..
'भगवान मुझे उठा ले
' बुला ले अपने पास '
ये जुमले सुनाने को मिलते है ...
परन्तु मेरे नाना और जीना चाहते है..... तो यानि....इस जीवन से उनका मन नहीं भरा... क्यों....
मामा की लाई दवाओं से और सेवा से उनकी तबियत संभल गयी.....
..........रात में मामा ने कहा कि नाना को निर्गुण नहीं सुनाओगे...? मेरे पास कोई जवाब न था ....
अगर मृत्यु सत्य है
... तो जीवन भी... महासत्य ....
ईश्वर ने अमर आत्मा बनाई है तो
...... नश्वर जीवन भी उस की ही कृति है.. .......
तो 'माया' से मोह .. क्यों ना हो.....?
..............और मैं निर्गुण नहीं सुना पाया ..
नानाजी आपकी जैसी जिन्दगी सब को मिले....
अब स्मृतियों में ...... प्रणाम .....
मुकेश भारती
गौचर, उत्तराखंड
मामा का फोन आया नाना जी की तबियत ठीक नहीं .
नाना तुम्हारी मम्मी को बुला रहे हैं
मै माँ को ले कर गया ... रस्ते में मैंने सोचा कि आज नाना जी को निर्गुण (माया मोह से मुक्त होने वाले कबीर भजन) सुनाऊंगा.. नाना जी के पास पहुंचा तो सच में उनकी दशा ठीक नहीं थी .. नानाजी दो दिन से खाना नहीं खा पा रहे थे ... पर
वे दवा माँग कर खा लिया करते थे ... मैंने देखा कि उनमें जीवन जीने की इच्छा बची हुई है .. वो जीना चाहते है .... तो क्या...निर्गुण..... माया .......
...आज के समय में जहाँ सामाजिक मूल्यों में गिरावट आयी है..... वृद्धाश्रम ....और Old age home में लोग रह रहे है...जहाँ ..
'भगवान मुझे उठा ले
' बुला ले अपने पास '
ये जुमले सुनाने को मिलते है ...
परन्तु मेरे नाना और जीना चाहते है..... तो यानि....इस जीवन से उनका मन नहीं भरा... क्यों....
मामा की लाई दवाओं से और सेवा से उनकी तबियत संभल गयी.....
..........रात में मामा ने कहा कि नाना को निर्गुण नहीं सुनाओगे...? मेरे पास कोई जवाब न था ....
अगर मृत्यु सत्य है
... तो जीवन भी... महासत्य ....
ईश्वर ने अमर आत्मा बनाई है तो
...... नश्वर जीवन भी उस की ही कृति है.. .......
तो 'माया' से मोह .. क्यों ना हो.....?
..............और मैं निर्गुण नहीं सुना पाया ..
नानाजी आपकी जैसी जिन्दगी सब को मिले....
अब स्मृतियों में ...... प्रणाम .....
मुकेश भारती
गौचर, उत्तराखंड
Saturday, December 25, 2010
देशभक्ति बनाम जरुरत
आज फिर से आपसे मुखातिब हूँ , आज कुछ ऐसा एहसास हुआ जो अपने को मध्यमवर्गीय भारतीय होने का एहसास करा गया.
आज क्रिसमस की छुट्टियाँ शुरू हुयी है , बहन के घर आया हुआ हूँ, साकेत (दिल्ली). भांजे को कहा चलो तुम्हें कुछ दिला लाऊं. साकेत डी एल ऐफ मॉल में गया, चारों तरफ विलासिता के साधनों की विदेशी (कंपनियों) दुकाने थी, पुहु मुझे खिलौनों की दुकान में ले गया, पर उसे वो न दिला सका जो उसे चाहिए था .......
आज जीवन में ठीक -ठाक यापन के लिए साधन मिल गया है , ऐसा समझाता था , विलासिता भरे संसाधनों के युग में अपने को साधरण होने का आभास ......
पुहु समझदार है.. कहा मामा आपको जूते लेने है न,, चलिए दूसरी दुकान चलते है... पर न ले सका ... जेब में पैसे है पर... याद आया .. पिछले समय जो जूते लिए थे लक्ष्मीनगर के 'अपर्क्स' शोरूम से उससे ढाई गुना कीमत ज्यादा है .....
दिल्ली हवाए अड्डे पर भी .....
कुछ खाने को दिल हुआ.... सब और विदेशी कंपनियों की दुकाने ..... थोडा घूमा तो 'हल्दीराम' की दुकान दिख गयी .. वही पाकेट से पैसे निकले .. स्वदेशी दुकान स्वदेशी जेब के लिए ...लगा स्वदेशी कंपनी आब हमरी राष्ट्रभक्ति की प्रतीक नहीं जरूरत और मज़बूरी बन गयी है .. क्यूंकि ये बाहर जो चारो तरफ छाई विदेशी दुकानें है वो आपको दूसरे दर्जे का , मध्यमवर्गीय होने का एहसास करा देती है..
आज क्रिसमस की छुट्टियाँ शुरू हुयी है , बहन के घर आया हुआ हूँ, साकेत (दिल्ली). भांजे को कहा चलो तुम्हें कुछ दिला लाऊं. साकेत डी एल ऐफ मॉल में गया, चारों तरफ विलासिता के साधनों की विदेशी (कंपनियों) दुकाने थी, पुहु मुझे खिलौनों की दुकान में ले गया, पर उसे वो न दिला सका जो उसे चाहिए था .......
आज जीवन में ठीक -ठाक यापन के लिए साधन मिल गया है , ऐसा समझाता था , विलासिता भरे संसाधनों के युग में अपने को साधरण होने का आभास ......
पुहु समझदार है.. कहा मामा आपको जूते लेने है न,, चलिए दूसरी दुकान चलते है... पर न ले सका ... जेब में पैसे है पर... याद आया .. पिछले समय जो जूते लिए थे लक्ष्मीनगर के 'अपर्क्स' शोरूम से उससे ढाई गुना कीमत ज्यादा है .....
दिल्ली हवाए अड्डे पर भी .....
कुछ खाने को दिल हुआ.... सब और विदेशी कंपनियों की दुकाने ..... थोडा घूमा तो 'हल्दीराम' की दुकान दिख गयी .. वही पाकेट से पैसे निकले .. स्वदेशी दुकान स्वदेशी जेब के लिए ...लगा स्वदेशी कंपनी आब हमरी राष्ट्रभक्ति की प्रतीक नहीं जरूरत और मज़बूरी बन गयी है .. क्यूंकि ये बाहर जो चारो तरफ छाई विदेशी दुकानें है वो आपको दूसरे दर्जे का , मध्यमवर्गीय होने का एहसास करा देती है..
मुकेश भारती ,
२५ दिसंबर २०१० ,
दिल्ली हवाई अड्डा से
Saturday, October 30, 2010
दर्द की दवा ब्लॉग नहीं
कई महीनों से अपनी प्रेमिका से दूर हूँ,
ये दूरी सताती है ,
रुलाती और परेशान भी करती है.....
" दुनिया के बारे में लिखते हो, पर मेरी याद में रोये ...तो ब्लॉग क्यों ना लिख लिया ?"
ये शिकायत थी उसकी .....
मैं उसके लिए कुछ भी नहीं लिख पाता हूँ .....
मेरी सोच इस दर्द को क्यों बयां नहीं कर पाती ..?
क्या करूँ ?
.... कैसे बताऊँ तुझे कि इस दर्द को तुझसे मिले बगैर नहीं मिटा सकता ...
मेरे दर्द की दवा बस मिलन और प्यार है.... ये ब्लॉग नहीं.....
--------.........---------.............---.....--..--..-...................
मुकेश भारती
30 अक्टूबर 2010
गोपेश्वर (उत्तराखंड)
ये दूरी सताती है ,
रुलाती और परेशान भी करती है.....
" दुनिया के बारे में लिखते हो, पर मेरी याद में रोये ...तो ब्लॉग क्यों ना लिख लिया ?"
ये शिकायत थी उसकी .....
मैं उसके लिए कुछ भी नहीं लिख पाता हूँ .....
मेरी सोच इस दर्द को क्यों बयां नहीं कर पाती ..?
क्या करूँ ?
.... कैसे बताऊँ तुझे कि इस दर्द को तुझसे मिले बगैर नहीं मिटा सकता ...
मेरे दर्द की दवा बस मिलन और प्यार है.... ये ब्लॉग नहीं.....
--------.........---------.............---.....--..--..-...................
मुकेश भारती
30 अक्टूबर 2010
गोपेश्वर (उत्तराखंड)
Wednesday, October 27, 2010
करवा चौथ का व्रत ... इतर सन्दर्भ
आज काफी समय के बाद आप से मुखातिब हो रहा हूँ . आज कुछ ऐसी बात कहने जा रहा हूँ . जो मेरे कुछ दोस्तों के दर्द को बढ़ा सकता है. कुछ पुराने घावों को ताजा कर सकता है .. माफ़ करना ...
उत्तर शायद आपके पास हो ?..?...?
पुनुमाला चिंता रहती है तुम दोनों की
मुकेश भारती
गोपेश्वर (उत्तराखंड)
27 अक्टूबर 2010
परम्परायें हमें विरासत में मिली है.. लेकिन इनको निभाना आसान नहीं.
करवा चौथ का व्रत सुहागिनों के साथ कुछ और भी लोग करते है, जिन्होंने किसी को अपना मान लिया है या प्रेम सम्बन्ध में है.
पर आज उसको व्रत करते देखा जिसका सम्बन्ध कुछ कारणों से नहीं रहा ..
उस महिला मित्र ने ठंढी आह से बताया था कि.... मजाक मजाक में ही शुरू हो गया.....
- शायद इस व्रत को ढोना उसकी मज़बूरी बन गयी है.
- या दिल का एक कोना ये कहता है कि शायद हमारा प्यार फिर हमें वापस मिल जायेगा .
शायद दिल के जज्बातों के उत्तर शब्दों से नहीं हो सकते... महसूस ही कर सकते है आप ...
उत्तर शायद आपके पास हो ?..?...?
पुनुमाला चिंता रहती है तुम दोनों की
मुकेश भारती
गोपेश्वर (उत्तराखंड)
27 अक्टूबर 2010
Thursday, August 19, 2010
बहना ... माफ़ कर देना तू..
"बहना! माफ़ कर देना..
इस बार नहीं आ रहा रक्षा बंधन पर .".
लगातार 4-5 सालों से यही कह रहा हूँ रूबी को.
शायद मज़बूरी या आदत बन गयी है.
वो सब जानती है ....
रूबी का पहले ही फोन आ जाता है .. अपना पता लिखा दो .
कहते हैं वाकई बचपन के दिन सुनहरे होते है .
हम दुनिया की चकाचौध में भूल जाते है.. महसूस होता है कि हम शिखर पर है,
पर जब रक्षा बंधन आता है तो मन और तन कहता है .. काश बचपन होता..
- रूबी रोज दिन पूछती थी - भैया क्या दे रहो हो..इस बार..
मैं भी माँ से रोज जिद करता की पैसे दे दो, रूबी को कुछ देना है.
फिर आधे पैसे का गिफ्ट और आधे पैसे में मेले की मौज...
आह !.. आज सब कुछ है पर....
उस 5 रुपये के उपहार से जो तू खुश होती थी...
उस समय ये लगता था 10 रूपये की ही चीज क्यों ना दे दी उसे ..
आज नहीं आने के कई कारण बता सकता हूँ ..
- आफिस से छुट्टी नहीं मिली .
- तेरी भाभी की तबियत ठीक नहीं है.
- प्रणय का टेस्ट होने वाला है.
- दीपिका अकेली रह जायेगी....
सच कहता हूँ रूबी आ जाता मगर...
Tuesday, August 10, 2010
माँ का कर्ज तो तुम्हीं अदा कर रहे हो...
लेह में भयंकर प्राकृतिक आपदा आयी है...
पूरा का पूरा लेह जल में लीन हो गया ....
पहले 132 फिर 300 फिर 500 ...........
लापता की तो गिनती ही हो रही है......
- जो हाथ सेवा, बचाव के लिए गए थे, वो थे हमरे सैनिक , भातिसिपू के जवान ,वायु सेना... कुछ सैलानी .
मैंने जीवन में इतनी भयंकर तबाही की खबर आज तक ना सुनी... शायद आप ने भी नहीं...
- भारतीय सेना ने तो माना ही है कि ये इतिहास का सबसे बड़ा बचाव और राहत कार्य है ...
जरा बचाव और राहत कैंप का दृश्य देखिये.....
बेटा .... पानी दे दो....
ला रहा हूँ माँ .......
भैयायया !!!!!! सिर दर्द से फटा जा रा है
अभी पट्टी बदल रहा हूँ .. आता हूँ..
दावा पी लो बहन ....
बेटा!!!!!!!!!!!!!!..ओ बेटा .... कहाँ चले गए तुम ....
लील लिया बाढ़ ने सब कुछ...
नहीं माँ... मैं हूँ ना तुम्हारे पास...
मेरा नन्हा बच्चा ....कहाँ ... बह गया.. ये तुम बाबू....
मिल जायेगा बहन ... ढूँढ रहें हैं हम लोग ....
सारा घर बर्बाद हो गया...
कोई नहीं हम बनायेंगे भैया ....
"ये सेवा करते हाथ , नया लेह बनाते हाथ.... संस्तुति करने वाले मुख से करोड़ गुणा अघिक हैं ...."
जरा गौर कीजिये
- एक बच्ची बचाव कार्य में मिली है... उसकी माँ... हस्पताल में ही है.... उस माँ को उसकी बच्ची से मिलाते वो हाथ ......
उस माँ की दर्द भरी आँखों में जिसने खुशियाँ वापस की है... उसे उस माँ का कैसे आशीर्वाद मिला होगा..........
हे सेना के जवानों तुम्हें शत् शत् नमन....
माँ का कर्ज तुम्हीं उतार रहे हो .....
मुकेश भारती
http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2010/08/100807_leh_gallery_vv.shtml 10 अगस्त 2010, गौचर, (उत्तराखंड)
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