एक साधारण आदमी का ब्लॉग.. जो समय के साथ ही बड़ा हो रहा है, थोड़ा भावुक है..अपनों को प्यार करता है..
स्वागत
mukeshuwach में आपका स्वागत है. यहाँ आप देखेगें सच्ची भावनायें, रूबरू होगें उन पलों से जो आपके मन को छू जायेगी..
Tuesday, March 1, 2022
Wednesday, March 2, 2016
माँ की चिठ्ठी सियाचिन के वीरो के नाम
मौत को मात देता चलता है ,
क्षण क्षण पल पल प्रतिपल प्रतिक्षण चल कर ।
मातृभूमि का कर्ज चुकाने निकला है
मेरा अणु अणु बह कर।।
सियाचिन दुनियां का सबसे ऊँचा युद्ध क्षेत्र , जहाँ दुश्मन की गोली लगे न लगे, -60 डिग्री तापमान की सर्दी मारने के लिए काफी है। देह का जो हिस्सा खुला रह गया जम जाता है।
वहाँ जब तू जाता है, तैनात रहता है, हड्डियों को गला कर साँसे जमा कर, आँखों से बस टकटकी सी बर्फ देखते.... सब को छोड़ मौत के संग खेलने को क्यों... मेरे लिए ही ना...
तेरी ठिठुरती हड्डियों और जमती हुई साँसों को महसूस कर सकू .. मेरी औकात नहीं.. बस ये कहूँगा की सुपर मैन भी तेरी बराबरी नहीं कर सकता।
2 फ़रवरी को जब तुम सब मौत के बर्फीले अंधड़ में फंसे तो सब कह रहे थे, अब शायद तू लौटेगा नहीं। पर मैंने भी तुझे जोर से आवाज़ sssssssss दी । आ गया न तू.... मेरे लिये.....
तेरी फ़िल्म देखी थी 26 जनवरी को डिस्कवरी पे.... इतनी जल्दी एक नयी कहानी जुड़ जायेगी सोचा न था... तूने कभी बताया नहीं की वहाँ जा कर बाल दाढ़ी नख कुछ भी नहीं बनाता.. मेरा योगी गया है न कैलाश पर....
जब तू मेरी पुकार पर लौट आया ... पर बोला कुछ नहीं.... आँखें आँसुओं से भरी तो थी पर छलकने न दिया... तेरी कसम की खातिर...
सुना है तू अपना श्राद्ध कर्म वहाँ जाने से पहले कर चुका है... कितना दानी है रे तू..
वहाँ रोज मरता रोज जीता प्राणों का उत्सर्ग करता.. फिर भी कहता है माँ तुम्हारा ऋण बहुत है...।
सियाचिन के उन तमाम शहीदो को नमन। .. माँ का ऋण नहीं रहा अब आप पर... ..
मुकेश भारती ,
मेरठ 10 फ़रवरी 2016
Tuesday, March 27, 2012
आस्था, चलन और संगीत
आज नवरात्रि का पहला दिन है... रात में ही हिदायत मिली थी के सुबह जल्दी उठना है पूजा करनी है... जल्दी उठा नहाया धोया ...
पर आज ये सब बाते क्यों कर रहा हूँ?
बात ही कुछ ऐसी है..
संगीत से हम भारतीयों का कुछ इस कदर लगाव है.. कि हर तीज- त्यौहार , पूजा यहाँ तक की दुःख में भी संगीत का प्रयोग होता है...
सुबह भी मैंने DVD ऑन किया ... भक्ति के गाने चलने लगे.. सब काम होते रहे.. घर साफ हो गया.. पूजा की थाली लग गयी , हवन सामग्री सज गयी.. दीप जल गया.. ... पर जब पूजा शुरु होने हो हुई तो .. DVD से "ख्वाजा मेरे ख्वाजा दिल में समा जा" (फ़िल्म जोधा -अकबर ) बजने लगा.. वो पूजा कर रही थी.. मैंने DVD बंद कर दूसरा गाना( देवी के गीत) चलाने की कोशिश कर ही रहा था के आवाज़ आई.. गाना क्यूँ बंद कर दिया...
मेरा उत्तर आपका उत्तर हो सकता है..
के भाई दुर्गा माँ जी की पूजा के समय मुसलमानी गीत...... अरे ये तो गजब हो जायेगा....
पर.. उसका उत्तर था ... भगवन तो एक ही है... सब गाने उसके ही...
अब मेरे जेहन में दो सवाल आये...
.............................क्या नयी सोच का चलन आ गया.
या वो संगीत की जादूगरी थी .....???
चलो... हम तो बदल गए पर वो.....???
मुकेश भारती ,
गौचर , उत्तराखंड .
२३-०३-२०१२
पर आज ये सब बाते क्यों कर रहा हूँ?
बात ही कुछ ऐसी है..
संगीत से हम भारतीयों का कुछ इस कदर लगाव है.. कि हर तीज- त्यौहार , पूजा यहाँ तक की दुःख में भी संगीत का प्रयोग होता है...
सुबह भी मैंने DVD ऑन किया ... भक्ति के गाने चलने लगे.. सब काम होते रहे.. घर साफ हो गया.. पूजा की थाली लग गयी , हवन सामग्री सज गयी.. दीप जल गया.. ... पर जब पूजा शुरु होने हो हुई तो .. DVD से "ख्वाजा मेरे ख्वाजा दिल में समा जा" (फ़िल्म जोधा -अकबर ) बजने लगा.. वो पूजा कर रही थी.. मैंने DVD बंद कर दूसरा गाना( देवी के गीत) चलाने की कोशिश कर ही रहा था के आवाज़ आई.. गाना क्यूँ बंद कर दिया...
मेरा उत्तर आपका उत्तर हो सकता है..
के भाई दुर्गा माँ जी की पूजा के समय मुसलमानी गीत...... अरे ये तो गजब हो जायेगा....
पर.. उसका उत्तर था ... भगवन तो एक ही है... सब गाने उसके ही...
अब मेरे जेहन में दो सवाल आये...
.............................क्या नयी सोच का चलन आ गया.
या वो संगीत की जादूगरी थी .....???
चलो... हम तो बदल गए पर वो.....???
मुकेश भारती ,
गौचर , उत्तराखंड .
२३-०३-२०१२
Saturday, August 27, 2011
अनशन और आत्मशुद्धि
आज कल अन्ना के अनशन की सब ओर चर्चा है .. यूँ कहें तो लोकपाल और अनशन का डंका बज रहा है ..
महात्मा गाँधी ने ये हथियार हम सब भारतीयों को दिया .. पर उसका उपयोग अन्ना जैसे ही कुछ लोग कर रहे है.
ये जो अनशन रूपी हथियार है, वह बाहरी भ्रष्टाचार से तो लड़ ही रहा है.. पर अपने अंदर के भ्रष्टाचार को भी मिटाता है .. देखिये एक बानगी ..
आदमी इस दुनिया में है तो कोई ना कोई कमी अवश्य रहती है, सुधार की गुन्जाइश इस दुनिया को छोडने से पहले तक.. लाज़मी है मेरे अंदर भी अवगुणों की भरमार है ..
ये अवगुण भी दो तरह के है .... एक जो सिर्फ अपने को हानि पहुँचते है .. और दूसरे ... जो हमें और दोस्त , दुनियाँ सब को ...
कड़वा सच बोलने की आदत के कारण एक मित्र का मेरे द्वारा समाज में अपमान हो गया.. हलाँकि वो थे भी इस काबिल .... परन्तु थोड़ी देर बाद ही ये महसूस हो गया कि.. कड़वा सच मुझे ही अब दुःख दे रहा है..
मन में ग्लानि हुई.. मित्र भी ऐसे थे कि मान अपमान को झाड़ कर चल पड़े .... सच कहें तो वो इस कदर ढीठ हो गये थे .. कि मान अपमान या गलती कर के उन्हें फर्क नहीं पड़ता .. जब उनके इस गुण को जाना तो दुःख और बढ़ गया ..
मन कचोटता रहा क्या करूँ ?
टीवी पर अन्ना दिख रहे थे , और उस पर उनके अनशन की खबर ...
बस सोंच लिया अनशन .. रात के भोजन का त्याग कर
अपने मन के मलाल को दूर कर लिया ....
लगा जैसे आत्मा शुद्ध हो गयी ..
......................................करना चाहेंगे आप भी आत्मशुद्धि ......
मुकेश भारती,
गौचर
चमोली, (उत्तराखंड)
महात्मा गाँधी ने ये हथियार हम सब भारतीयों को दिया .. पर उसका उपयोग अन्ना जैसे ही कुछ लोग कर रहे है.
ये जो अनशन रूपी हथियार है, वह बाहरी भ्रष्टाचार से तो लड़ ही रहा है.. पर अपने अंदर के भ्रष्टाचार को भी मिटाता है .. देखिये एक बानगी ..
आदमी इस दुनिया में है तो कोई ना कोई कमी अवश्य रहती है, सुधार की गुन्जाइश इस दुनिया को छोडने से पहले तक.. लाज़मी है मेरे अंदर भी अवगुणों की भरमार है ..
ये अवगुण भी दो तरह के है .... एक जो सिर्फ अपने को हानि पहुँचते है .. और दूसरे ... जो हमें और दोस्त , दुनियाँ सब को ...
कड़वा सच बोलने की आदत के कारण एक मित्र का मेरे द्वारा समाज में अपमान हो गया.. हलाँकि वो थे भी इस काबिल .... परन्तु थोड़ी देर बाद ही ये महसूस हो गया कि.. कड़वा सच मुझे ही अब दुःख दे रहा है..
मन में ग्लानि हुई.. मित्र भी ऐसे थे कि मान अपमान को झाड़ कर चल पड़े .... सच कहें तो वो इस कदर ढीठ हो गये थे .. कि मान अपमान या गलती कर के उन्हें फर्क नहीं पड़ता .. जब उनके इस गुण को जाना तो दुःख और बढ़ गया ..
मन कचोटता रहा क्या करूँ ?
टीवी पर अन्ना दिख रहे थे , और उस पर उनके अनशन की खबर ...
बस सोंच लिया अनशन .. रात के भोजन का त्याग कर
अपने मन के मलाल को दूर कर लिया ....
लगा जैसे आत्मा शुद्ध हो गयी ..
......................................करना चाहेंगे आप भी आत्मशुद्धि ......
मुकेश भारती,
गौचर
चमोली, (उत्तराखंड)
Sunday, May 1, 2011
आ रहा हूँ... मैं ...
अप्रैल का महीना खत्म......
मई शरू...........
कुछ बात है इस महीने में..
आज ग्यारह साल हो गये बाहर निकले... पर आज तक मुझको इस महीने का हर साल इंतजार रहता है...
क्यूँ..? बचपन में गाते थे
गर्मी की ये सभी छुट्टियाँ नाना -नानी जी के नाम...
अब मम्मी .. बाबूजी के नाम...
चलो चले अपने नगर और गावं जहाँ हम पैदा हुये....
चलो चले .. उस बाग में जहाँ आम लीची.. चुरा कर खाया करते थे..
चलो चले उस ममता की छाँव में ... जिसकी गंध को जी तरसता है..
चलो मिले... अपने.. मातृभूमि की खुशहाली और बदहाली से ...
चलो मिले... उनसे जिन्होंने हमारे लिए सपना देखा था... और देख रहे है...
उनसे रु ब रु होने.. जिसका ही अंश हो तुम..
..................................... पूरा साल निकल गया... बाबूजी माँ से रोज पूछते होगे..है कब चलेगा .. किस गाड़ी में.. टिकट है...... उस राह देखती आँखों... को...
उसकी प्यास बुझाने .... अब चलो ...
अब बस .. और नहीं...
चलो....
माँ ... आ रहा हूँ.. मैं .......
मुकेश भारती
गौचर ,उत्तराखंड .
01 मई 2011
मई शरू...........
कुछ बात है इस महीने में..
आज ग्यारह साल हो गये बाहर निकले... पर आज तक मुझको इस महीने का हर साल इंतजार रहता है...
क्यूँ..? बचपन में गाते थे
गर्मी की ये सभी छुट्टियाँ नाना -नानी जी के नाम...
अब मम्मी .. बाबूजी के नाम...
चलो चले अपने नगर और गावं जहाँ हम पैदा हुये....
चलो चले .. उस बाग में जहाँ आम लीची.. चुरा कर खाया करते थे..
चलो चले उस ममता की छाँव में ... जिसकी गंध को जी तरसता है..
चलो मिले... अपने.. मातृभूमि की खुशहाली और बदहाली से ...
चलो मिले... उनसे जिन्होंने हमारे लिए सपना देखा था... और देख रहे है...
उनसे रु ब रु होने.. जिसका ही अंश हो तुम..
..................................... पूरा साल निकल गया... बाबूजी माँ से रोज पूछते होगे..है कब चलेगा .. किस गाड़ी में.. टिकट है...... उस राह देखती आँखों... को...
उसकी प्यास बुझाने .... अब चलो ...
अब बस .. और नहीं...
चलो....
माँ ... आ रहा हूँ.. मैं .......
मुकेश भारती
गौचर ,उत्तराखंड .
01 मई 2011
Tuesday, March 15, 2011
आँचल की गंध
आँचल की गंध
2 जी 3जी नेट इन्टरनेट .... कॉल फोन कॉल .... चैट .... वीडियो चैट.... और क्या क्या...
लगता है हम 24 घंटे .. सारी दुनिया से जुडे हुए .... अलग है ही नहीं .....
अब साल ...दो साल में घर जाओ ...
कोइ बात नहीं ना जाओ सब मनैज हो जाता है .. तब भी..........
पर.... कुछ.. लगता है अपने को की ये ठीक है या नहीं ..
एक बानगी ...
एक लंबा अर्सा हो गया .. तुम से मिले .....
मन कुछ ठीक नहीं लग रहा है,
क्यों बेटा ...? क्यों परेशान हो रहे हो ?
बात तो कर ही लेती हूँ ...
हाँ..... वो तो सब ठीक है ...
बेटा .. तुमने वीडियो चैट करना सिखाया था ....
उससे तुमको देख भी लेती हूँ....
वो सब तो ठीक है.... माँ पर...
बेटा .... तो क्या......
.................माँ पर तेरे आँचल की गंघ नहीं आती .........
मुकेश भारती
चंडीगढ़ से ,
15-03-2011
Monday, February 21, 2011
Sunday, January 9, 2011
सुना नहीं पाया 'निर्गुण'
छुट्टियों में घर पर था .
मामा का फोन आया नाना जी की तबियत ठीक नहीं .
नाना तुम्हारी मम्मी को बुला रहे हैं
मै माँ को ले कर गया ... रस्ते में मैंने सोचा कि आज नाना जी को निर्गुण (माया मोह से मुक्त होने वाले कबीर भजन) सुनाऊंगा.. नाना जी के पास पहुंचा तो सच में उनकी दशा ठीक नहीं थी .. नानाजी दो दिन से खाना नहीं खा पा रहे थे ... पर
वे दवा माँग कर खा लिया करते थे ... मैंने देखा कि उनमें जीवन जीने की इच्छा बची हुई है .. वो जीना चाहते है .... तो क्या...निर्गुण..... माया .......
...आज के समय में जहाँ सामाजिक मूल्यों में गिरावट आयी है..... वृद्धाश्रम ....और Old age home में लोग रह रहे है...जहाँ ..
'भगवान मुझे उठा ले
' बुला ले अपने पास '
ये जुमले सुनाने को मिलते है ...
परन्तु मेरे नाना और जीना चाहते है..... तो यानि....इस जीवन से उनका मन नहीं भरा... क्यों....
मामा की लाई दवाओं से और सेवा से उनकी तबियत संभल गयी.....
..........रात में मामा ने कहा कि नाना को निर्गुण नहीं सुनाओगे...? मेरे पास कोई जवाब न था ....
अगर मृत्यु सत्य है
... तो जीवन भी... महासत्य ....
ईश्वर ने अमर आत्मा बनाई है तो
...... नश्वर जीवन भी उस की ही कृति है.. .......
तो 'माया' से मोह .. क्यों ना हो.....?
..............और मैं निर्गुण नहीं सुना पाया ..
नानाजी आपकी जैसी जिन्दगी सब को मिले....
अब स्मृतियों में ...... प्रणाम .....
मुकेश भारती
गौचर, उत्तराखंड
मामा का फोन आया नाना जी की तबियत ठीक नहीं .
नाना तुम्हारी मम्मी को बुला रहे हैं
मै माँ को ले कर गया ... रस्ते में मैंने सोचा कि आज नाना जी को निर्गुण (माया मोह से मुक्त होने वाले कबीर भजन) सुनाऊंगा.. नाना जी के पास पहुंचा तो सच में उनकी दशा ठीक नहीं थी .. नानाजी दो दिन से खाना नहीं खा पा रहे थे ... पर
वे दवा माँग कर खा लिया करते थे ... मैंने देखा कि उनमें जीवन जीने की इच्छा बची हुई है .. वो जीना चाहते है .... तो क्या...निर्गुण..... माया .......
...आज के समय में जहाँ सामाजिक मूल्यों में गिरावट आयी है..... वृद्धाश्रम ....और Old age home में लोग रह रहे है...जहाँ ..
'भगवान मुझे उठा ले
' बुला ले अपने पास '
ये जुमले सुनाने को मिलते है ...
परन्तु मेरे नाना और जीना चाहते है..... तो यानि....इस जीवन से उनका मन नहीं भरा... क्यों....
मामा की लाई दवाओं से और सेवा से उनकी तबियत संभल गयी.....
..........रात में मामा ने कहा कि नाना को निर्गुण नहीं सुनाओगे...? मेरे पास कोई जवाब न था ....
अगर मृत्यु सत्य है
... तो जीवन भी... महासत्य ....
ईश्वर ने अमर आत्मा बनाई है तो
...... नश्वर जीवन भी उस की ही कृति है.. .......
तो 'माया' से मोह .. क्यों ना हो.....?
..............और मैं निर्गुण नहीं सुना पाया ..
नानाजी आपकी जैसी जिन्दगी सब को मिले....
अब स्मृतियों में ...... प्रणाम .....
मुकेश भारती
गौचर, उत्तराखंड
Saturday, December 25, 2010
देशभक्ति बनाम जरुरत
आज फिर से आपसे मुखातिब हूँ , आज कुछ ऐसा एहसास हुआ जो अपने को मध्यमवर्गीय भारतीय होने का एहसास करा गया.
आज क्रिसमस की छुट्टियाँ शुरू हुयी है , बहन के घर आया हुआ हूँ, साकेत (दिल्ली). भांजे को कहा चलो तुम्हें कुछ दिला लाऊं. साकेत डी एल ऐफ मॉल में गया, चारों तरफ विलासिता के साधनों की विदेशी (कंपनियों) दुकाने थी, पुहु मुझे खिलौनों की दुकान में ले गया, पर उसे वो न दिला सका जो उसे चाहिए था .......
आज जीवन में ठीक -ठाक यापन के लिए साधन मिल गया है , ऐसा समझाता था , विलासिता भरे संसाधनों के युग में अपने को साधरण होने का आभास ......
पुहु समझदार है.. कहा मामा आपको जूते लेने है न,, चलिए दूसरी दुकान चलते है... पर न ले सका ... जेब में पैसे है पर... याद आया .. पिछले समय जो जूते लिए थे लक्ष्मीनगर के 'अपर्क्स' शोरूम से उससे ढाई गुना कीमत ज्यादा है .....
दिल्ली हवाए अड्डे पर भी .....
कुछ खाने को दिल हुआ.... सब और विदेशी कंपनियों की दुकाने ..... थोडा घूमा तो 'हल्दीराम' की दुकान दिख गयी .. वही पाकेट से पैसे निकले .. स्वदेशी दुकान स्वदेशी जेब के लिए ...लगा स्वदेशी कंपनी आब हमरी राष्ट्रभक्ति की प्रतीक नहीं जरूरत और मज़बूरी बन गयी है .. क्यूंकि ये बाहर जो चारो तरफ छाई विदेशी दुकानें है वो आपको दूसरे दर्जे का , मध्यमवर्गीय होने का एहसास करा देती है..
आज क्रिसमस की छुट्टियाँ शुरू हुयी है , बहन के घर आया हुआ हूँ, साकेत (दिल्ली). भांजे को कहा चलो तुम्हें कुछ दिला लाऊं. साकेत डी एल ऐफ मॉल में गया, चारों तरफ विलासिता के साधनों की विदेशी (कंपनियों) दुकाने थी, पुहु मुझे खिलौनों की दुकान में ले गया, पर उसे वो न दिला सका जो उसे चाहिए था .......
आज जीवन में ठीक -ठाक यापन के लिए साधन मिल गया है , ऐसा समझाता था , विलासिता भरे संसाधनों के युग में अपने को साधरण होने का आभास ......
पुहु समझदार है.. कहा मामा आपको जूते लेने है न,, चलिए दूसरी दुकान चलते है... पर न ले सका ... जेब में पैसे है पर... याद आया .. पिछले समय जो जूते लिए थे लक्ष्मीनगर के 'अपर्क्स' शोरूम से उससे ढाई गुना कीमत ज्यादा है .....
दिल्ली हवाए अड्डे पर भी .....
कुछ खाने को दिल हुआ.... सब और विदेशी कंपनियों की दुकाने ..... थोडा घूमा तो 'हल्दीराम' की दुकान दिख गयी .. वही पाकेट से पैसे निकले .. स्वदेशी दुकान स्वदेशी जेब के लिए ...लगा स्वदेशी कंपनी आब हमरी राष्ट्रभक्ति की प्रतीक नहीं जरूरत और मज़बूरी बन गयी है .. क्यूंकि ये बाहर जो चारो तरफ छाई विदेशी दुकानें है वो आपको दूसरे दर्जे का , मध्यमवर्गीय होने का एहसास करा देती है..
मुकेश भारती ,
२५ दिसंबर २०१० ,
दिल्ली हवाई अड्डा से
Saturday, October 30, 2010
दर्द की दवा ब्लॉग नहीं
कई महीनों से अपनी प्रेमिका से दूर हूँ,
ये दूरी सताती है ,
रुलाती और परेशान भी करती है.....
" दुनिया के बारे में लिखते हो, पर मेरी याद में रोये ...तो ब्लॉग क्यों ना लिख लिया ?"
ये शिकायत थी उसकी .....
मैं उसके लिए कुछ भी नहीं लिख पाता हूँ .....
मेरी सोच इस दर्द को क्यों बयां नहीं कर पाती ..?
क्या करूँ ?
.... कैसे बताऊँ तुझे कि इस दर्द को तुझसे मिले बगैर नहीं मिटा सकता ...
मेरे दर्द की दवा बस मिलन और प्यार है.... ये ब्लॉग नहीं.....
--------.........---------.............---.....--..--..-...................
मुकेश भारती
30 अक्टूबर 2010
गोपेश्वर (उत्तराखंड)
ये दूरी सताती है ,
रुलाती और परेशान भी करती है.....
" दुनिया के बारे में लिखते हो, पर मेरी याद में रोये ...तो ब्लॉग क्यों ना लिख लिया ?"
ये शिकायत थी उसकी .....
मैं उसके लिए कुछ भी नहीं लिख पाता हूँ .....
मेरी सोच इस दर्द को क्यों बयां नहीं कर पाती ..?
क्या करूँ ?
.... कैसे बताऊँ तुझे कि इस दर्द को तुझसे मिले बगैर नहीं मिटा सकता ...
मेरे दर्द की दवा बस मिलन और प्यार है.... ये ब्लॉग नहीं.....
--------.........---------.............---.....--..--..-...................
मुकेश भारती
30 अक्टूबर 2010
गोपेश्वर (उत्तराखंड)
Wednesday, October 27, 2010
करवा चौथ का व्रत ... इतर सन्दर्भ
आज काफी समय के बाद आप से मुखातिब हो रहा हूँ . आज कुछ ऐसी बात कहने जा रहा हूँ . जो मेरे कुछ दोस्तों के दर्द को बढ़ा सकता है. कुछ पुराने घावों को ताजा कर सकता है .. माफ़ करना ...
उत्तर शायद आपके पास हो ?..?...?
पुनुमाला चिंता रहती है तुम दोनों की
मुकेश भारती
गोपेश्वर (उत्तराखंड)
27 अक्टूबर 2010
परम्परायें हमें विरासत में मिली है.. लेकिन इनको निभाना आसान नहीं.
करवा चौथ का व्रत सुहागिनों के साथ कुछ और भी लोग करते है, जिन्होंने किसी को अपना मान लिया है या प्रेम सम्बन्ध में है.
पर आज उसको व्रत करते देखा जिसका सम्बन्ध कुछ कारणों से नहीं रहा ..
उस महिला मित्र ने ठंढी आह से बताया था कि.... मजाक मजाक में ही शुरू हो गया.....
- शायद इस व्रत को ढोना उसकी मज़बूरी बन गयी है.
- या दिल का एक कोना ये कहता है कि शायद हमारा प्यार फिर हमें वापस मिल जायेगा .
शायद दिल के जज्बातों के उत्तर शब्दों से नहीं हो सकते... महसूस ही कर सकते है आप ...
उत्तर शायद आपके पास हो ?..?...?
पुनुमाला चिंता रहती है तुम दोनों की
मुकेश भारती
गोपेश्वर (उत्तराखंड)
27 अक्टूबर 2010
Thursday, August 19, 2010
बहना ... माफ़ कर देना तू..
"बहना! माफ़ कर देना..
इस बार नहीं आ रहा रक्षा बंधन पर .".
लगातार 4-5 सालों से यही कह रहा हूँ रूबी को.
शायद मज़बूरी या आदत बन गयी है.
वो सब जानती है ....
रूबी का पहले ही फोन आ जाता है .. अपना पता लिखा दो .
कहते हैं वाकई बचपन के दिन सुनहरे होते है .
हम दुनिया की चकाचौध में भूल जाते है.. महसूस होता है कि हम शिखर पर है,
पर जब रक्षा बंधन आता है तो मन और तन कहता है .. काश बचपन होता..
- रूबी रोज दिन पूछती थी - भैया क्या दे रहो हो..इस बार..
मैं भी माँ से रोज जिद करता की पैसे दे दो, रूबी को कुछ देना है.
फिर आधे पैसे का गिफ्ट और आधे पैसे में मेले की मौज...
आह !.. आज सब कुछ है पर....
उस 5 रुपये के उपहार से जो तू खुश होती थी...
उस समय ये लगता था 10 रूपये की ही चीज क्यों ना दे दी उसे ..
आज नहीं आने के कई कारण बता सकता हूँ ..
- आफिस से छुट्टी नहीं मिली .
- तेरी भाभी की तबियत ठीक नहीं है.
- प्रणय का टेस्ट होने वाला है.
- दीपिका अकेली रह जायेगी....
सच कहता हूँ रूबी आ जाता मगर...
Tuesday, August 10, 2010
माँ का कर्ज तो तुम्हीं अदा कर रहे हो...
लेह में भयंकर प्राकृतिक आपदा आयी है...
पूरा का पूरा लेह जल में लीन हो गया ....
पहले 132 फिर 300 फिर 500 ...........
लापता की तो गिनती ही हो रही है......
- जो हाथ सेवा, बचाव के लिए गए थे, वो थे हमरे सैनिक , भातिसिपू के जवान ,वायु सेना... कुछ सैलानी .
मैंने जीवन में इतनी भयंकर तबाही की खबर आज तक ना सुनी... शायद आप ने भी नहीं...
- भारतीय सेना ने तो माना ही है कि ये इतिहास का सबसे बड़ा बचाव और राहत कार्य है ...
जरा बचाव और राहत कैंप का दृश्य देखिये.....
बेटा .... पानी दे दो....
ला रहा हूँ माँ .......
भैयायया !!!!!! सिर दर्द से फटा जा रा है
अभी पट्टी बदल रहा हूँ .. आता हूँ..
दावा पी लो बहन ....
बेटा!!!!!!!!!!!!!!..ओ बेटा .... कहाँ चले गए तुम ....
लील लिया बाढ़ ने सब कुछ...
नहीं माँ... मैं हूँ ना तुम्हारे पास...
मेरा नन्हा बच्चा ....कहाँ ... बह गया.. ये तुम बाबू....
मिल जायेगा बहन ... ढूँढ रहें हैं हम लोग ....
सारा घर बर्बाद हो गया...
कोई नहीं हम बनायेंगे भैया ....
"ये सेवा करते हाथ , नया लेह बनाते हाथ.... संस्तुति करने वाले मुख से करोड़ गुणा अघिक हैं ...."
जरा गौर कीजिये
- एक बच्ची बचाव कार्य में मिली है... उसकी माँ... हस्पताल में ही है.... उस माँ को उसकी बच्ची से मिलाते वो हाथ ......
उस माँ की दर्द भरी आँखों में जिसने खुशियाँ वापस की है... उसे उस माँ का कैसे आशीर्वाद मिला होगा..........
हे सेना के जवानों तुम्हें शत् शत् नमन....
माँ का कर्ज तुम्हीं उतार रहे हो .....
मुकेश भारती
http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2010/08/100807_leh_gallery_vv.shtml 10 अगस्त 2010, गौचर, (उत्तराखंड)
Thursday, August 5, 2010
और लिखने बैठ गया.........
जब टाइम से खाना खा लिया.. अपना ईमेल देख लिया, दोस्तों से चैट कर लिया.. दोस्तों के कुछ शिकवे- गिले दूर कर लिये .. धीमे......... धीमे.. सब आफ लाइन होने लगते हैं......
प्रेमी प्रेमिका को फोन लगते ........ लगाते.......... जब ना लगे...
तब हम जैसे एकाकी लोग सच में अपने अकेलेपन को महसूस करते है ..
समय कटते ना कटता हो.. तो संगीत .... अपने पसंद का सुन लिया.. पर फिर भी आँखे खुली रहें तो...
यकायक याद आता है.. माँ का आंचल... छुट्टियों में बिताए पल, कुछ पूरे अधूरे किये काम.. जिसको पूरा करना... अब उनकी जिम्मेवारी बन गयी है... लगता है जैसे फ़िल्म देख रहा था अब तक, जब घर कि याद आई तो पता चला तीन घंटे का शो.. खत्म हो गया हो .....
सच में जो जीवन हम अपने कार्यस्थल पर जी रहें होते हैं... वो तो Reel life hi hai..(ऑफिस छोडते ही भूल जाओ). real life तो अब चल रही है...
जैसे सारी बातें rewind होने लगाती हैं... बाबूजी बोलते थे नालायक .. माँ भी जब स्कूल से लौट कर आती तो मोहल्ले से शिकायत ही मिलती थी...
पर अब .....
आते समय बाबू जी रो रहें थे... बाबूजी ...ये पापा लोग दिखने में जितने सख्तजान होते है ना, अंदर से उतने ही मुलायम..... माँ तो हिम्मती होती है...
माँ, बाबूजी... और अपना घर ......
............और लिखने बैठ गया.........
माँ, बाबूजी बचपन ला दो.... आप याद नहीं आते .... आपको अपने साथ जीता हूँ मैं ..........
5 अगस्त 2010,गुरुवार
गौचर (उत्तराखंड)
प्रेमी प्रेमिका को फोन लगते ........ लगाते.......... जब ना लगे...
तब हम जैसे एकाकी लोग सच में अपने अकेलेपन को महसूस करते है ..
समय कटते ना कटता हो.. तो संगीत .... अपने पसंद का सुन लिया.. पर फिर भी आँखे खुली रहें तो...
यकायक याद आता है.. माँ का आंचल... छुट्टियों में बिताए पल, कुछ पूरे अधूरे किये काम.. जिसको पूरा करना... अब उनकी जिम्मेवारी बन गयी है... लगता है जैसे फ़िल्म देख रहा था अब तक, जब घर कि याद आई तो पता चला तीन घंटे का शो.. खत्म हो गया हो .....
सच में जो जीवन हम अपने कार्यस्थल पर जी रहें होते हैं... वो तो Reel life hi hai..(ऑफिस छोडते ही भूल जाओ). real life तो अब चल रही है...
जैसे सारी बातें rewind होने लगाती हैं... बाबूजी बोलते थे नालायक .. माँ भी जब स्कूल से लौट कर आती तो मोहल्ले से शिकायत ही मिलती थी...
पर अब .....
आते समय बाबू जी रो रहें थे... बाबूजी ...ये पापा लोग दिखने में जितने सख्तजान होते है ना, अंदर से उतने ही मुलायम..... माँ तो हिम्मती होती है...
माँ, बाबूजी... और अपना घर ......
............और लिखने बैठ गया.........
माँ, बाबूजी बचपन ला दो.... आप याद नहीं आते .... आपको अपने साथ जीता हूँ मैं ..........
5 अगस्त 2010,गुरुवार
गौचर (उत्तराखंड)
Tuesday, August 3, 2010
तुझे क्या चाहिए ?
आज मेरे एक मित्र ने पूछा - आपको जन्मदिन पर क्या चाहिए ? मैं सोच में पड़ गया... कुछ बता ना पाया..
क्या हम जो चाहते वो हमें मिल जाता है ?
दोस्तों यही यक्ष प्रश्न हम सब के सामने होता है.. कि हमें क्या चाहिए ?...
अच्छी नौकरी, अच्छा घर, अच्छा जीवनसाथी ..... बहुत सारी बातें मन में आ सकती है.. हम माध्यम वर्ग के लोग सब कुछ चाहते है..कोशिश भी करते है, पा भी लेते है.. पर उसके बाद.. पुनः नयी कामनायें हमारे सामने होती है... कामनाओं का अंत नहीं है..
तो क्या हम सपने देखना बंद कर दे ? सन्यासी बन जाये.. ना.. ये कामनायें ही है जो हमें जीवन में आगे बढने की प्रेरणा देते है...
पर आगे बढने से पहले हम उस रस्ते को भी जरुर देखे.. जिसमे किसी का नुकसान ना हो या कम से कम हो.. ... कोई हमारे बढ़ते पैरों के नीचे ना आ जाये.. हम किसी को धक्का ना दे दे.. क्योंकि वो सफलता आपको बाद में जरुर असंतुष्ट करेगी .. साधारण रूप से मानव मानसिक शान्ति चाहता है... हम और आप भी...
तो सपने देखो, और उनको पूरा करो अपने दम पर, अपने दोस्तों के दम पर, आपने अच्छे व्यवहार के दम पर ...
तब जो सफलता मिलेगी वो आपको जरुर आत्मिक शांति और आनन्द देगी ... ....
तो तैयार हैं ..........
मुकेश भारती ,
गौचर,उत्तराखंड
Monday, August 2, 2010
जा तुझे सपने पूरे करने है..
आज- कल में सब कॉलेज खुल जायेगे.. सब बच्चे माँ, पापा, दीदी, भाई , नन्हें नन्हीं ... को छोड़ कर आपने कॉलेज को जायेगे.. रूडकी, कोचिन. बेंगलुरु, कोलकाता, पुणे, और कहाँ ...कहाँ .... गौतम, विकास , शोभित, अनुराग, रोजी.. सब जा रहें है.. एक दिन हम भी निकले थे.. पूरा करने सपनों को आपनों को छोड़ कर...
माँ , पापा,, के सपने... बस तू जहाँ रहें... अच्छे से रहें..
भैया ... जा मस्त रहना...
....... जा तुझे सपने पूरे करने हैं ..
गौतम मिस करता हूँ तुमको...
2अगस्त 2010
माँ , पापा,, के सपने... बस तू जहाँ रहें... अच्छे से रहें..
भैया ... जा मस्त रहना...
....... जा तुझे सपने पूरे करने हैं ..
गौतम मिस करता हूँ तुमको...
2अगस्त 2010
Sunday, August 1, 2010
ना! ये तेरा नहीं है...
कभी कभी हमें ये लगता है कि हमने वो सब कुछ पा लिया जो हमें चाहिए था..पर कुछ ही समय बाद पता चलता है कि वो सब एक टूटता हुआ सपना था. उस टूटते सपनो को वही महशूस कर सकता है जिसने उसे बुना है.. टूटते सपनों की घुटन.. लगता है जीवन एक बोझ हो गया.. पर क्या ये जीवन हमारा है? नहीं ये तो माता पिता के द्वारा हमें ईश्वर ने दिया है. बस हम इसे जीने के अधिकारी है.. जैसे एक घर हो किराये का...
क्या हमें अपने टूटे सपनो का दर्द नहीं होना चाहिए .... जरुर,,,
पर दर्द जीवन पर भरी ना हो जाये... टूटते सपनो को जोड़ सको तो जोड़ो.. पर... टूट गए सपनो को बुनाने मत बैठो .. फिर कोइ नया सपना बुनो जो अपना हो... जीवन जीने की राहे अनेक है. जियो जी भर के..
राजेश मिस करता हूँ तुमको... मुकेश भारती
१ अगस्त २०१०
क्या हमें अपने टूटे सपनो का दर्द नहीं होना चाहिए .... जरुर,,,
पर दर्द जीवन पर भरी ना हो जाये... टूटते सपनो को जोड़ सको तो जोड़ो.. पर... टूट गए सपनो को बुनाने मत बैठो .. फिर कोइ नया सपना बुनो जो अपना हो... जीवन जीने की राहे अनेक है. जियो जी भर के..
राजेश मिस करता हूँ तुमको... मुकेश भारती
१ अगस्त २०१०
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